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अमिताभ बच्चन की पिंक मूवी का रिव्यू पढे

Pink movie review 2016 : पिंक मूवी ने आज की हमारी पूरुषवादी सोच पर फिर एक सवाल उठाया है। ये मूवी पूरुषवादी मानसिकता के खिलाफ कड़ा संदेश है। की आज हमारे समाज पूरुष और महिलाओं अलग अलग पैमाने पर रखा जाता है। ये फिल्म बताती है कि पूरुष अगर ताकतवर परिवार से हो तों महीला किस प्रकार न्याय के लिये संघर्ष करना पड़ता है। पीड़ित महिला के लिये न्याय की लड़ाई लड़ना कठिन हो जाती है। फिल्म समाज की उस सोच पर भी सवाल उठाया है जो लड़कियों की छोटी स्कर्ट पहनने व लडको के साथ ड्रिंक करने पर उनके चरित्र को खराब बताते है। फ़िल्म में ये भी बताया गया है कि महिला चाहे सेक्स वर्कर हो या खुद की पत्नी हो उसके ‘न’ कहने पर उसको चुना या जबरदस्ती करना अपराध है।
फ़िल्म की कहानी की शुरुआत इस प्रकार होती है की दिल्ली के पॅाश इलाके में रहने वाली तीन लड़कियाँ मिनल (तापसी), फलक (र्किती) और आंद्रिया (आंद्रिया) की कहानी है। मिडिल क्लास फैमलीं की लड़कीयाँ है। जो किराये में रहती है। एक रात तीनों लड़कियाँ फन के लिये निकलती है।
ये तीनों लडकियां राजवीर व अन्य दो लड़को के साथ सुरजकुंडा के एक रिपोर्ट में डिनर इन्विटेसन स्वीकार कर लेती है। कुछ ड्रिंक के बाद यह रात उन तीनों लड़कियों के लिये सबक बननें वाली थी। आंद्रिया महसूस करती है की डंपी (राशुल टंड़न) उसे गलत तरीके से छुने की कोशिश करता है ताकत के नशे में चूर राजवीर (अंगद बेदी) मिनल के मना करने बाद भी उसे छेडने की कोशिश करता है।
मिनल अपनी आत्मरक्षा में कॅाच की बोतल से हमला करती है जो उसकी आँख पे लगती है और आँख से खून निकलने लगता है। और वो वहाँ से चली जाती है। उन्हें लगता है कि बात आयी गई हो गयी। लेकिन ये तीनों लडके उनको बदनाम करने व डराने की कोशिश करते है । तीनों लड़कियों पर उस वक्त गाज ही गिर जाती है, जब छेड़खानी की कोशिश करने वाला राजवीर अपने ताकतवर लिंक्स का इस्तेमाल कर इनके खिलाफ प्रॉस्टिट्यूशन का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करा देता है। इसके बाद तीनों को फरार होना पड़ता है और मुश्किलों की शुरुआत होती है।

मामला कोर्ट में पहुंचता है, जहां वकील दीपक सहगल (अमिताभ), जो खुद मेन्टल डिसऑर्डर का शिकार है, लड़कियों का केस लड़ता है। फिल्म में ड्रामे की शुरुआत यहीं से होती है। कोर्ट रूम में सुनवाई के दौरान मीनल से उसकी वर्जिनिटी और ड्रिंकिंग हैबिट्स पर सवाल पूछे जाते हैं। इन सवालों के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई है, समाज किस तरह से दोहरे मानकों पर लड़के और लड़कियों को रखता है।

अमिताभ बच्चन समेत सभी कलाकारों ने अपनी भूमिका से न्याय किया है। क्रिएटिव प्रड्यूसर कहे जाने वाले शुजित सरकार के खाते में विक्की डोनर, मद्रास कैफे और पीके के बाद एक और शानदार फिल्म जुड़ गई है।अमिताभ एक फिर साबित कर दिया कि वे इस सदी के महानायक है।

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